11 अप्रैल 2009

हम मानव है

सूर्य जलता है
अपने अस्तित्व के साथ
इस तपो वन मे
हमें जीवन देने के लिए
जलना ही इसका जीवन है
नदी बहती है
खुद को विलीन करने के लिए
ताकि हम प्या से न रहे
खेत सूखे न रहे
बहना ही इसका अर्पण है
बादल बरसते है
मिटा देते है खुद को
धरती की हरियाली के लिए
हमारी खुसहाली के लिए
बरसना ही इनका समर्पण है
व़क्ष बढते है
जड तना पत्तीयो संग
खुद को समर्पित करते है
हमारी सेवा के लिए
ताकि हम आबाद रहे
यही नका तर्पण है
हवा चलती है
दे कर शीतल बयार
विलीन हो जाती है
उस अनन्त मे
जिसका कोई अन्तह नही
हम मानव है
जी लेते है खुद मर्जी से
मिट जाते है खुद गर्जी से

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