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12 अक्टूबर 2011

अनन्त

आत्मा की अनन्त योनियो में एक है मानव योनि ,यह योनी देवताओ के लिए भी दुर्लभ बताइ गयी है ा इसकी सही व्याख्या का अधिकार एवं योग्यकता तो केवल अनन्त कोटी ब्रह्रामाण्ड नायक मे ही निहित है,लेकिन स्वअन्त; सुखाय की भावना से व परब्रह्रा के आर्शिवाद से इसकी टुटी-फुटी व्याख्या आपके चिन्त न के लिए प्रस्तुत है , आर्शीवाद की अपेक्षा में------------------- समस्त जड –चेतन मे निहित सत्ता का नाम आत्मा है, जो परमात्मा के अविनाशी अंग के रूप मे सभी भूत प्राणियो मे निहित रहती है,जो अनन्त‍ शक्तियो का स्रोत समझी जाती है इस शक्ति के संचालन के लिए जिन संचालक यन्त्रो की आवश्‍यकता होती है उन यन्त्रो मे सबसे सामर्थ्यवान यंत्र मानव शरीर है इसमें विवेक वुद्धि का जो अपार सागर निहित है, वह किसी भी अन्य योनि के भाग्य में नही लिखा है, मानव शरीर समस्ति प्रत्यक्ष घटनाओ का स्वत. दृष्टा होता है अन्य योनियॉ इस भॉति दृष्टा नही होती जिस प्रकार मानव धटनाओ को देखकर उसका मंथन कर लेता है वैसा किसी अन्य योनि में सम्भव नही है ामानव को अभ्यास की एक ऐसी विरासत प्राप्त है जिसक माध्यम से मानव अजान-से जान ,मूर्खसे विद्धान अबोध से बोध अवस्था को प्राप्त होता है,मानव जीवन का सबसे बडा साध्य उस अजात को जात करना है ,जिसके जान मा्त्र से उसे न तो किसी वस्तु की अपेक्षा रहती है न ही उसके लिए कोइ वस्तु दुर्लभ ही रहती है ा नि. सन्दे ह यह संसार नस्वर है किन्तु यह मानव का कुरूक्षेत्र है यहॉ की भैतिक वस्तुये मानव के साथ नही जाती है किन्तु कर्मो के साथ निहित अभैातिक अनुराग उसके साथ जाता है अविश्वासनीय रूप से उस अनुराग केा त्या्गने की व्यवस्था् भी मानव को उपलव्ध इसी जगत मे होती है किन्तु कोइ विरला मानव तन ही उसका उपयोग कर पाता है अधिकांश तो और भी कठोरता से उसमे लिप्त हो जाते है ा
मानव शरीर सर्वोच्च साधन है इसमे अवसर की अधिकता है,कर्म माध्यम है, इस भव सागर से पार जाने के लिए अन्य् योनियो को यह सौभाग्य कहॉ ा
मानव शरीर सर्वोच्च् साधन है साधन दो है यदि तुम शरीर के अन्द‍र उस आत्मा की खोज करना चाहते हो तो यह जान मार्ग हे,यदि वाहर खोज करना चाहते हो तो यह भक्ति मार्ग है
इसमे अवसर की अधिकता है संसार के आरोह अवरोह ही इसके अवसर है
कर्म माध्यकम है, आरोह अवरोहो पर विजय पाने की कला ही तुम्हारा कम्र है,वह विजय जो नये आरोह अवरोहो को न जन्म दे इति

जो हमने देखा'''''''''''''''वो तुम भी जानो

13 मार्च 2009

संदेश

अपने प्रारब्‍ध के लिए स्‍वयं मनुष्‍य उत्‍तर दायी है

11 मार्च 2009

बडे भाग मानुष तन पावा

आत्मा की अनन्त योनियो में एक है मानव योनि ,यह योनी देवताओ के लिए भी दुर्लभ बताइ गयी है ा इसकी सही व्याख्या का अधिकार एवं योग्यकता तो केवल अनन्त कोटी ब्रह्रामाण्ड नायक मे ही निहित है,लेकिन स्वअन्त; सुखाय की भावना से व परब्रह्रा के आर्शिवाद से इसकी टुटी-फुटी व्याख्या आपके चिन्त न के लिए प्रस्तुत है , आर्शीवाद की अपेक्षा में------------------- समस्त जड –चेतन मे निहित सत्ता का नाम आत्मा है, जो परमात्मा के अविनाशी अंग के रूप मे सभी भूत प्राणियो मे निहित रहती है,जो अनन्त‍ शक्तियो का स्रोत समझी जाती है इस शक्ति के संचालन के लिए जिन संचालक यन्त्रो की आवश्‍यकता होती है उन यन्त्रो मे सबसे सामर्थ्यवान यंत्र मानव शरीर है इसमें विवेक वुद्धि का जो अपार सागर निहित है, वह किसी भी अन्य योनि के भाग्य में नही लिखा है, मानव शरीर समस्ति प्रत्यक्ष घटनाओ का स्वत. दृष्टा होता है अन्य योनियॉ इस भॉति दृष्टा नही होती जिस प्रकार मानव धटनाओ को देखकर उसका मंथन कर लेता है वैसा किसी अन्य योनि में सम्भव नही है ामानव को अभ्यास की एक ऐसी विरासत प्राप्त है जिसक माध्यम से मानव अजान-से जान ,मूर्खसे विद्धान अबोध से बोध अवस्था को प्राप्त होता है,मानव जीवन का सबसे बडा साध्य उस अजात को जात करना है ,जिसके जान मा्त्र से उसे न तो किसी वस्तु की अपेक्षा रहती है न ही उसके लिए कोइ वस्तु दुर्लभ ही रहती है ा नि. सन्दे ह यह संसार नस्वर है किन्तु यह मानव का कुरूक्षेत्र है यहॉ की भैतिक वस्तुये मानव के साथ नही जाती है किन्तु कर्मो के साथ निहित अभैातिक अनुराग उसके साथ जाता है अविश्वासनीय रूप से उस अनुराग केा त्या्गने की व्यवस्था् भी मानव को उपलव्ध इसी जगत मे होती है किन्तु कोइ विरला मानव तन ही उसका उपयोग कर पाता है अधिकांश तो और भी कठोरता से उसमे लिप्त हो जाते है ा
मानव शरीर सर्वोच्च साधन है इसमे अवसर की अधिकता है,कर्म माध्यम है, इस भव सागर से पार जाने के लिए अन्य् योनियो को यह सौभाग्य कहॉ ा
मानव शरीर सर्वोच्च् साधन है साधन दो है यदि तुम शरीर के अन्द‍र उस आत्मा की खोज करना चाहते हो तो यह जान मार्ग हे,यदि वाहर खोज करना चाहते हो तो यह भक्ति मार्ग है
इसमे अवसर की अधिकता है संसार के आरोह अवरोह ही इसके अवसर है
कर्म माध्यकम है, आरोह अवरोहो पर विजय पाने की कला ही तुम्हारा कम्र है,वह विजय जो नये आरोह अवरोहो को न जन्म दे इति

7 मार्च 2009

सत्‍य

सत्‍य को इश्‍वर माना जाता हैं,फिर भी सत्‍य का अन्‍वेषण काने वाला परेशान होता है,जब कि असत्‍य के मार्ग पर चलने वाले की राह आसान प्रतीत होती है,इस लिए सत्‍यान्‍वेषियो की तुलना में असत्‍य का अनुसरण करने वालो की संख्‍या अधिक दिखाइ देती है ऐसा क्‍यो होता हैं ।यह सदा से मनुष्‍य के विचार का विषय रहा हैा इस प्रश्‍न के उत्‍तर को जानने से पूर्व यह जानना आवश्‍यक है कि मनुष्‍य के संचय का लक्ष्‍य क्‍या है ,निश्‍चित रूप से शक्ति ,एक सांसारिक छण भ्‍ागुर शक्ति होती है तो असत्‍य के मार्ग से प्रप्‍त होती है दूसरी आध्‍यातमिक वास्‍तविक शक्ति ासांसारिक शक्ति जहॉ उसे इस माया लोक में उलझाती है वही आध्‍यात्मिक शक्ति उसके मुक्‍ती का मार्ग प्रशस्‍त करती है ा आध्‍यात्मिक शक्ति अमूल्‍य धरोहर है जिसे बडी तपस्‍या से प्राप्‍त किया जाता है इसे सत्‍य के पथ के अनुसरण द्धारा ही प्राप्‍त किया ता सकता है इससे जगत नियन्‍ता का साक्षात्‍कार एवं स्‍वयं के अस्‍तीत्‍व का बोध होता है यह कभी न मिटने वाली वह थाती है जो युग युगान्‍तर तक आपको मार्गदर्शन कराती है ा

4 मार्च 2009

अबाध

अरस्तुल ने कहा था मनुष्यी राजनैतिक प्राणी है ,कालान्तहर मे इसकी सत-प्रतिशत परिण्ती हुइ ,मनुष्यन ने राजनीति को अपने जीवन का एक महत्व पूर्ण्‍ अंग बना लिया ,राजनैतिक शक्ति का केन्द्र भविष्य का सबसे ससक्त केन्द्र सावित हुआ ,मानव जीवन के हर पक्ष मे राजनीति ने अपना दबदबा बनाये रखा लेकिन फिर भी आदर्श के चंगुल से यह अपने को मुक्तप नही करा सकी थी इस सीमा तक कल्याेण्‍ कारी उद़देश्यो के पूर्ती की आशा इससे की जा सकती थी
कालान्तिर मे परिद़श्यर बदला अाधुनिक राजनीति के जनक मैकियावेली का उदय हुआ आपने यह सिद्ध किसा कि राजनीति मनुष्यो‍ के लिए नही है वरन मनुष्यै ही राजनीति के लिए है छल-कपट-झूठ-फरेब-स्वाेर्थ राजपीति के आधार स्त म्भ बने , पूरे विश्व ने इसका स्वाकगत किया यह स्वसच्छ न्दफ थ्‍ी अनियंि‍त्रत थ्‍ी आदर्श का स्थाभन स्वारर्थ ने ले लिया, मानव कल्यािण्‍ का स्थानन स्वल-कल्यादण्‍ ने ले लिया ा इसकी चमक की चकाचौध ने मनुष्यथ की ऑखो को चौधिया दिया वह अब बहुत दूर तक देख पाने की सामर्थ्ये खो बैठा निहित स्वानथो ने उसे अन्धाक बना दिया ा आशा वादियो एवं निराशा वादियो मे केवल एक समानता रह गयी दोनो की ही शान्ती् छिन गयी ा

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