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13 दिसंबर 2011

मंजिल

ये शाम यू ही ढलेगी 
ये रात यू ही चलेगी 
दिन का उजियाला आयेगा 
जीवन का फसाना गायेगा
ये पहिया यूही घूमेगा 
वक्‍त यू ही झूमेगा 
तुम चल सकते हो तो चल जाओ 
तुम ढल सकते हो तो ढल जाओ 
इतिहास यही दुहरायेगा 
अंजाम वही बतलायेगा
है यही फसाना दुनिया का
अंजाम पुराना दुनिया का
जो वक्‍त के आगे रहता है 
अंजाम वही बस सहता है
इतिहास वही दुहराता है 
मंजिल पर पहुच जो पाता है





11 अप्रैल 2009

हम मानव है

सूर्य जलता है
अपने अस्तित्व के साथ
इस तपो वन मे
हमें जीवन देने के लिए
जलना ही इसका जीवन है
नदी बहती है
खुद को विलीन करने के लिए
ताकि हम प्या से न रहे
खेत सूखे न रहे
बहना ही इसका अर्पण है
बादल बरसते है
मिटा देते है खुद को
धरती की हरियाली के लिए
हमारी खुसहाली के लिए
बरसना ही इनका समर्पण है
व़क्ष बढते है
जड तना पत्तीयो संग
खुद को समर्पित करते है
हमारी सेवा के लिए
ताकि हम आबाद रहे
यही नका तर्पण है
हवा चलती है
दे कर शीतल बयार
विलीन हो जाती है
उस अनन्त मे
जिसका कोई अन्तह नही
हम मानव है
जी लेते है खुद मर्जी से
मिट जाते है खुद गर्जी से

28 मार्च 2009

मैं नही था

मै प्रकाश नही था

पर देख सकता था

जलते हुये मकान को
उसी के प्रकाश मे

गिरते हुये अस्तित्‍व के साथ


मैं ऑच नही था

पर महसूस कर रहा था

तपते हुये जीवन की

दहकती हुयी ज्‍वाला को

उसी की तृष्‍णा के साथ


में धारा नही था

पर बह रहा था

भावनाओ के भॅवर मे

उसी के चर्कवात मे

उसीके संकल्‍पो विकल्‍पो के साथ

अनन्‍त

अभिलाषाओ ने दी
जीवन को गति
मन की न रूकने वाली

ये अनन्‍त अभिलाषाये

जीवन की न थमने वाली

ये अनन्‍त गतियॉं
नित बनते नुतन सपने
सजती सपनो की डोली

हम देखते रह गये इस

अनन्‍त मझधार वाली नौका को
और बुनते रहे
उस पार जाने के सपने

न आया किनारा

न थमी अभिलाषाये

सपने भी बन्‍द नही हुये

डोली भी सजी रह गयी

गति चलती रह गयी

न रहा देखने वाला

वह विलीन हो गया

उस अनन्‍त में

जिसका कोई अन्‍त नही

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